तापसी पन्नू इन दिनों बॉक्स ऑफिस पर धमाल मचा रही फिल्म 'मिशन मंगल' में अपने किरदार को लेकर चर्चा में हैं। मल्टीस्टारर फिल्म में वह एक साइंटिस्ट और हाउसवाइफ के बीच बखूबी बैलंस निभाती नजर आ रही हैं। इस मुलाकात में तापसी हमसे अपनी इस फिल्म, कंगना संग कॉन्ट्रोवर्सी, ऐक्टर-ऐक्ट्रेसेज के पे स्केल में अंतर जैसे मुद्दों पर दिल खोलकर बातचीत की। अमूमन फीमेल स्टार मल्टीस्टारर फिल्मों में काम करना अवॉइड करती हैं। आपने यह फिल्म क्यों की? मुझे इंडिया की पहली स्पेस फिल्म का हिस्सा बनना था, जो कि रियल इंसिडेंट पर आधारित हो। दूसरा कारण यह था कि ज्यादातर ऐक्टर्स एक साथ आते नहीं हैं। मैंने अभी तक जितनी फिल्में की हैं, उसमें या तो मैं अकेली हूं या फिर कोई एक ऐक्टर है साथ में। इस फिल्म की खासियत यह है कि यहां पर इतने कलाकार होने के बावजूद हर कोई लीड है। ऐसा बहुत कम होता है। रही बात मल्टीस्टारर की तो लड़के भी ऐसा ही करते हैं। आप देखेंगी तो फीमेल ऐक्टर्स मेल ऐक्टर्स की तुलना में ज्यादा मल्टीस्टारर फिल्में करती हैं। सबको अहसास हो गया है कि कहानी बहुत दमदार है और हिट होगी ही तो कोई भी हिट फिल्म का हिस्सा बनने से खुद को कैसे रोक सकता है। भारत की पहली स्पेस फिल्म है 'मिशन मंगल'। दर्शकों की शिकायत होती है कि बॉलिवुड टेक्नॉलजी में अभी भी वेस्ट से पीछे है। आपकी राय? हम टेक्नॉलजी में पीछे नहीं होते हैं, दरसअल, दिक्कत यहां बजट की होती है। इसलिए, क्योंकि वहां फिल्मों का जितना बजट होता है, उसके एक तिहाई बजट में तो हमने मंगल ग्रह पर सैटलाइट भेज दिया था। हमारी प्रॉब्लम यह है कि हमारे पास सीमित स्क्रीन्स और थिअटर हैं। यही वजह है कि बजट भी लिमिटेड हो जाता है। इससे हमारे विजुअल इफेक्ट्स उस लेवल के नहीं हो पाते हैं, जो उनकी फिल्मों में दिखाए जाते हैं। हालांकि, हैरानी की बात यह है कि पश्चिम की ज्यादातर फिल्मों में विजुअल इफेक्ट्स पर काम करने वाले आर्टिस्ट इंडियंस ही होते हैं। आप कभी अवतार या अवेंजर्स देखें, फिल्म के विजुअल क्रेडिट्स पर इंडियंस का ही नाम होता है। टेक्नॉलजी के मामले में हमसे ज्यादा होशियार कोई है ही नहीं दुनिया में। एक तरफ लड़कियां चांद और मंगल में जा रही हैं। वहीं, दूसरी तरफ उन्हें अपने बेसिक हक तक के लिए लड़ना पड़ता है। क्या कहेंगी? एक फेमस डायलॉग है, कोई भी देश परफेक्ट नहीं होता है, उसे बनाना पड़ता है। प्रॉब्लम हर देश में होती है। रेप के केसेज से तो पूरी दुनिया जूझ रही है। बात यही है कि या तो हम सभी बैठकर उन प्रॉब्लम्स पर रोते रहें या फिर उसके लिए कुछ करें। मैं तो यही कहूंगी कि हम सभी को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी और अपने-अपने हिस्से का योगदान देना होगा। अब खोट निकालने से आगे बढ़कर कुछ करने की बारी है। कोई ऐसा पल, जब आपने एम्पावर महसूस किया हो? जब मुझे एक ऐसी फिल्म का ऑफर मिला था, जिसकी कहानी मुझे बहुत पसंद आई थी। मैंने एक प्रड्यूसर से कैजुअली स्क्रिप्ट डिस्कस किया। उसने जाकर उसके राइट्स खरीदे, उसके साथ स्टूडियो और डायरेक्टर जुड़ा, क्योंकि मुझे वह करनी थी। यह फिल्म अच्छे बजट में बन रही है। मेरे लिए वह बहुत बड़ा दिन था। ऐसा लगा, चलो कुछ तो हासिल किया है कि कोई मेरे पर इतना पैसा लगाने को तैयार है। आपने लगातार फीमेल सेंट्रिक फिल्में करके एक ट्रेंड बदला है। इस पर क्या कहना चाहेंगी? यह न मेरे लिए ट्रैजिडी सी हो गई है। माइंडसेट तो अभी भी नहीं बदला है। आज भी आकर लोग मुझसे पूछते हैं कि फिल्म में हीरो कौन है? दूसरी ट्रैजिडी यह है कि अगर रोल बराबर वाले ही क्यों न हो, लेकिन मुझे बड़े ऐक्टर्स के साथ काम करने का मौका ही नहीं मिल रहा है। एक हीरो की फीस कभी-कभी फिल्म के बजट के बराबर होती है, हिरोइन सेंट्रिक फिल्म में भी। आप देखें, कई बार बड़ी बजट फिल्मों में ऐक्ट्रेसेज छोटे-छोटे रोल्स करने के लिए राजी हो जाती हैं, लेकिन ऐसा कभी नहीं होता कि कोई लीड ऐक्ट्रेस हो तो कोई बड़ा ऐक्टर उसमें छोटा रोल कर रहा हो। चाहे दीपिका या अनुष्का को ही ले लें, अगर वे किसी फिल्म में प्रोटैगनिस्ट हैं, तो उनके ऑपोजिट बड़े नाम नहीं देखेंगी आप। मैं ऐसा रोल नहीं करना चाहती, जो हल्का हो। अगर स्ट्रॉन्ग रोल हो, तो बड़े हीरो हामी नहीं भरते हैं। ऐसी दिक्कत तो मुझे हर स्क्रिप्ट पर होती है।
from Entertainment News in Hindi, Latest Bollywood Movies News, मनोरंजन न्यूज़, बॉलीवुड मूवी न्यूज़ | Navbharat Times https://ift.tt/2PgjB23
Comments
Post a Comment